Thursday, 16 June 2011

दोस्त दोस्त ना रहा ...

दोस्त दोस्त ना रहा
प्यार प्यार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा

अमानतें मैं प्यार की
गया था जिसको सौंप कर
वो मेरे दोस्त तुम ही थे
तुम्हीं तो थे
जो ज़िंदगी की राह मे
बने थे मेरे हमसफ़र
वो मेरे दोस्त तुम ही थे
तुम्हीं तो थे
सारे भेद खुल गए
राज़दार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा
दोस्त दोस्त ना रहा ...

सफ़र के वक़्त में पलक पे
मोतियों को तौलती
वो तुम ना थी तो कौन था
तुम्हीं तो थी
नशे की रात ढल गयी
अब खुमार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा
ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा
दोस्त दोस्त ना रहा ...

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ..

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में
फूल नहीं मेरा दिल है
प्रीयतम मेरे तुम भी लिखना
क्या ये तुम्हारे क़ाबिल है
प्यार छिपा है ख़त में इतना
जितने सागर में मोती
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा
पास जो मेरे तुम होती
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ...

नींद तुम्हें तो आती होगी
क्या देखा तुमने सपना
आँख खुली तो तन्हाई थी
सपना हो न सका अपना
तन्हाई हम दूर करेंगे
ले आओ तुम शेहनाई
प्रीत लगा के भूल न जाना
प्रीत तुम्हीं ने सिखलाई
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ...

ख़त से जी भरता ही नहीं
अब नैन मिले तो चैन मिले
चाँद हमारी अंगना उतरे
कोई तो ऐसी रैन मिले
मिलना हो तो कैसे मिले हम
मिलने की सूरत लिख दो
नैन बिछाये बैठे हैं हम
कब आओगे ख़त लिख दो
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में ..

हम थे जिनके सहारे .

हम थे जिनके सहारे, वो हुए ना हमारे
डूबी जब दिल की नय्या, सामने थे किनारे
हम थे जिनके सहारे ...

क्या मुहब्बत के वादे, क्या वफ़ा के इरादे
रेत की हैं दीवारें, जो भी चाहे गिरा दे
जो भी चाहे गिरा दे
हम थे जिनके सहारे ...

है सभी कुछ जहाँ में, दोस्ती है वफ़ा है
अपनी ये कमनसीबी, हमको ना कुछ भी मिला है
हमको ना कुछ भी मिला है
हम थे जिनके सहारे ...

यूँ तो दुनिया बसेगी, तनहाई फिर भी डसेगी
जो ज़िंदगी में कमी थी, वो कमी तो रहेगी
वो कमी तो रहेगी
हम थे जिनके सहारे .

Monday, 13 June 2011

तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

जब तुम्हे मुझ पर यक़ीन हो जाये,
मेरी बातों में तुमको सच्चाई दिखने लग जाये,
मेरी ऑखों के आँसू पानी है,जब ये भ्रम टूट जाये,
जब तुमको लगे की,तुम बिल्कुल अकेली हो,
तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

जब तुम्हारे पास जीने की कोई उम्मीद ना हो,
तुम्हारे ऑसू पोछने के लिये कोई तुम्हारे करीब ना हो,
जब तुमको लगे की अब अकेले चलना नामुमकिन है,
ये जिन्दगी का रास्ता अब बहुत कठीन है,
तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

जब तुमको तुम्हारा अकेलापन सताने लगे,
किसी की याद तुमको रुलाने लगे,
जब तुम्हारे ऑखों मे ऑसु सूख जाये,
और ऑखे रोने के लिये व्याकुल हो जाये,
तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

जब कोई तुम्हारा हृदय तोड़ दे,
बीच राह मे तुम्हे छोड़ दे,
तुम्हारी सॉसे उखड़ने लगे,
और तुम्हे मेरी याद आने लगे,
तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

मेरा प्यार इस जमाने के प्यार जैसा निश्चल नही है,
क्योंकी मेरा प्यार खुद मेरे लिये नहीं है,
इस प्यार के दिये को तेरी खातिर जलाया है,
जब इस दिये को लौ टिमटिमाने लग जाये,
तुम मुझे उस दिन प्यार करना.

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जानकार सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है 

आ गया गर बस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

बावजूदे-इद्दआ-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो ज़माना याद है
 

-----------------------हसरत मोहानी

मेरी याद में

मेरी याद में तुम ना, आंसू बहाना
ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना

समझना के था एक, सपना सुहाना
वो गुज़रा ज़माना, मुझे भूल जाना

मेरी याद में

जुदा मेरी मंजिल, जुदा तेरी राहें
जुदा मेरी मंजिल, जुदा तेरी राहें
मिलेंगी ना अब तेरी मेरी निगाहें
मुझे तेरी दुनिया से, है दूर जाना
ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना

मेरी याद में

ये रो रो के कहता है, टूटा हुआ दिल
ये रो रो के कहता है, टूटा हुआ दिल
नहीं हूँ मैं तेरी मोहब्बत के काबिल
मेरा नाम तक अपने, लब पे ना लाना
ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना

मेरी याद में तुम ना, आंसू बहाना
ना जी को जलाना, मुझे भूल जाना

समझना के था एक, सपना सुहाना
वो गुज़रा ज़माना,मुझे भूल जाना

मेरी याद में

जब मैं छोटा था


जब मैं छोटा था ,
शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी
मुझे याद है मेरे घर से स्कूल तक का वो रास्ता ,
क्या क्या नहीं था वहां, चाट के ठेले , जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां मोबाइल शॉप, विडियो पार्लर हैं,
फिर भी सब सूना है
शायद अब दुनिया सिमट रही है
जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े, घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी साइकिल रेस, वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है,
शायद वक्त सिमट रहा है
जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना,
वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी ट्राफिक सिग्नल पे मिलते हैं
“Hi” हो जाती है, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल पर बस SMS आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं
जब मैं छोटा था,
तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट केक, टिप्पी टीपी टाप
अब **internet, office, से फुर्सत ही नहीं मिलती
शायद ज़िन्दगी बदल रही है
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है
जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है…
मंजिल तो यही थी,
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते
ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..
अब बच गए इस पल में
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं
कुछ रफ़्तार धीमी करो, मेरे दोस्त, और इस ज़िंदगी को जियो…
खूब जियो मेरे दोस्त, और औरों को भी जीने दो.

कहते हैं चले आना

जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना
सन्देस मिलन का भूल न जाना मेरा प्यार ना बिसराना
मैं पलकन डगर बुहारूंगा, तेरी राह निहारूंगा
मेरी प्रीत का काजल तुम अपने नैनों में मले आना
जहां पहली बार मिले थे हम, जिस जगह से संग चले थे हम
नदिया के किनारे आज उसी, अमवा के तले आना
नी रे ग, रे ग, म ग रे स स नी
प प म, रे ग, स नी स ग प म प
नित सांझ सवेरे मिलते हैं, उन्हें देखके तारे खिलते हैं
लेते हैं विदा एक दूजे से कहते हैं चले आना

अब तो दिल कर दे मेरे हवाले


ये रात की स्याही किसने डाली,
मेरे दिल के उजाले में
ये आग किसने डाली
मेरे मौम से ख्वाबों में
ये आवाज़ किसने डाली,
मेरी खामोशियों में
मेरे सुकून में जलजला लाने वाले,
अब तो नकाब उठा दे
इरादे अपने बता दे,
या तो साथ मेरे होले,
या अपना पता बता दे
निरंतर जज्बातों से खेलने वाले,
अब तो दिल कर दे मेरे हवाले

Wednesday, 8 June 2011

आग जलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।


आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।


हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

                                            

               .

मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

डस रही है आजकल जो ये हवा
अब नहीं है शेष कोई भी हवा
उस हवा को कैद करना चाहता हूँ
मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

काम जो पुरखे हमारे कर गए
बाँट कर भारत को खंडित कर गए
मै उसे फिर अखंड करना चाहता हूँ
मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

भूलना होगा हमें इतिहास क्या है ?
देखना है आज अपने पास क्या है ?
रूढ़ियों को ही कुचलना चाहता हूँ
मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

मै गलत हूँ या सही मालूम नहीं
किन्तु काले नाग को डरता नहीं
अजगरों को ही निगलना चाहता हूँ
मै दिशा को ही बदलना चाहता हूँ

तो दर्द का सैलाब हूँ

स अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.
जो ना समझ सके, उनके लिये “कौन”.
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.
दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.
सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.
आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ

हँसना है रोना है

हँसना है रोना है
जिन्दगी एक खिलौना है
टूटेगा यह एक दिन
माटी का यह भगोना है
कितने प्यार से बनाया
कुम्हार ने इसे
मगर है तो खिलौना है
रंग भरे चाहत के इसमें
खुब इसे पकाया
वक़्त से पहले टूटे ना
खुद टूट इसे बचाया
काहें का अभिमान
क्या अपना यहाँ समान
फिर साथ क्या ढोना है
टूटेगा यह एक दिन
जिन्दगी एक खिलौना है
भर भाव ठंडक के
शीतल बन भुझा प्यास
मुसाफिर है भगोना है
टूटना मुझे भी एक दिन
''पवन'' भी तो खिलौना है
------पवन अरोड़ा------

Monday, 6 June 2011

वह खून कहो किस मतलब का

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे उबाल का नाम नहीं,
वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं.

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे जीवन ना रवानी हैं,
जो परवश होकर बहता हैं वह खून नहीं हैं पानी हैं.

उस दिन दुनिया ने सही सही खून की कीमत पहचानी थी,
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मांगी उनसे कुर्बानी थी.

बोले स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हे करना होगा,
तुम बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा.

आज़ादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जायेगी,
वह सुनो तुम्हारे शीशों के फूलों से गुंथी जायेगी.

आज़ादी का संग्राम कही पैसे पर खेला जाता हैं ,
यह शीश काटने का सौदा नंगे सर झेला जाता हैं.

आज़ादी का इतिहास कही काली स्याही लिख पाती हैं ?
इसको लिखने के लिए खून की नदी बहाई जाती हैं.

यह कहते कहते वक्ता की आँखों में लहू उतर आया,
मुझ रक्त वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिम काया.

अजनुबाहू ऊँची करके वो बोले " रक्त मुझे देना "
इसके बदले में भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना.

हो गयी सभा में उथल-पुथल सीने में दिल ना समाते थे,
स्वर इन्कलाब के नारों का कोसों तक छाये जाते थे.

हम देंगे-देंगे खून शब्द बस यही सुनाई देते थे,
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे.

बोले सुभाष ऐसे नहीं बातों से मतलब सरता हैं,
लो यह कागज़ हैं कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता हैं.

इसको भरने वाले जन को सर्वस्व समर्पण करना हैं,
अपना तन-मन -धन जीवन माता को अर्पण करना हैं.

पर यह साधारण पत्र नहीं आज़ादी का परवाना हैं,
इसपर तुमको अपने तन का कुछ उज्जवल रक्त गिराना हैं.

वह आगे आये जिसके तन में भारतीय खून बहता हो,
वह आगे आये जो अपने को हिंदुस्थानी कहता हो.

वह आगे आये जो इसपर खुनी हस्ताक्षर देता हो ,
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ आये, जो हसकर इसको लेता हो.

सारी जनता हुंकार उठी हम आते हैं हम आते हैं,
माता के चरणों में यह लो हम अपना रक्त चढाते हैं.

साहस से बढे युवक उस दिन,देखा बढ़ते ही आते थे,
चाक़ू-छुरी कटियारों से वो अपना रक्त गिराते थे.

फिर उसी रक्त स्याही में वो अपनी कलम डुबाते थे,
आज़ादी के परवाने पर वो हस्ताक्षर करते जाते थे.

उस दिन तारों ने देखा हिंदुस्थानी इतिहास नया,
जब लिखा महा रणवीरों ने खूं से अपना इतिहास नया.

श्री गोपाल प्रसाद व्यास !!

मंजिलें उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है

मंजिलें उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है
पंखो से कुछ नहीं होता हौसलों से उडान होती है

मत कर इतना यकीन हाथों की इन लकीरों पर
तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते

मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती है, स्वप्न के परदे निगाहों से हटती है
हौसला मत हार गिर कर ऐ मुसाफिर, ठोकरें इंसान को चलना सिखाती है

हवा में ताश का घर नहीं बनता, रोने से बिगडे मुक़द्दर नहीं बनता
दुनिया जीतने का हौसला रखो ऐ दोस्तों, एक जीत से कोई सिकंदर नहीं बनता

जहाँ हर सर झुक जाए वही मंदिर है, जहाँ हर नदी मिल जाये वही समंदर है
ज़िन्दगी हर मोड़ पर एक युद्ध है जो हर युद्ध जीत जाये वही सिकंदर है

ईश्वर का दिया कभी 'अल्प' नहीं होता,जो टूट जाये वो 'संकल्प' नहीं होता,हार को लक्ष्य से दूर ही रखना,क्यूंकि जीत का कोई 'विकल्प' नहीं होता....


Never think that how many moments in your life
Think that how lives in a moment

आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती




जीवन निकल गया तो जीने का ढंग आया
जब शमा बुझ गई तो महफ़िल में रंग आया
दिमाग की मशीनरी ने तब चलना सीखा
जब बुढे तन के हर एक पुर्जे में जंग आया
गाडी निकल गयी तो घर से चला मुसाफिर
मामुस हाथ मलता वापिस बैरंग आया
फुर्सत के वक़्त में न सुमिरन का वक़्त माँगा
उस वक़्त, वक़्त माँगा जब वक़्त तंग आया

इस देश के टुकड़े किसने किये ?

इस देश के टुकड़े किसने किये ?


सन सैंतालिस में किसने धोखा दिया ?
जबकि देश ने इन पर भरोसा किया ॥ 
बेरोजगारी,महँगाई से जनता है त्रस्त । 
अन्न सड़ रहा गोदामों में नेता हो गए भ्रष्ट ॥
ये कैसी आजादी – कैसा कानून ?
क्या इसके लिए दिया था देशभक्तों ने खून ?
एक होंगे --- एक रहेंगे ।  
न लुटेंगे न लूटने देंगे ॥ 
जब-जब जनता जागी है ,
भ्रष्टों-दुष्टों की जमात भागी है॥ 
इन दुष्टों को समझ में नहीं आता है ।
ये देश मात्र जमीन नहीं हमारी माता है ॥
इस देश के टुकड़े किसने किये ?
चाचा जी जब जिद्द पर अड़े ॥ 
कौन देश भक्त कौन गद्दार।
जान गयी  जनता हो गयी समझदार॥
अपने देश में हैं-अपने बैंक,
क्यों बुलाये विदेशी बैंक ?
देशभक्त जनता का समर्थन ।  
अब हो सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन॥
जो अब भी चेता नहीं ।
वो भारत माँ का बेटा नहीं ॥
जो नहीं देश और भगवान का ।
वो नेता नहीं हमारे काम का ॥ 
देश भक्तों का अभियान ।
भारत स्वाभिमान ॥
ऋषियों के वंशज समझ रहे हैं । 
असुरों के वंशज भड़क रहे हैं ॥
भ्रष्टाचार को संस्कार मत बनाओ।
पिछलग्गुओ होश में आओ होश में आओ॥
जागो सोने वालों जागो, अपनी जिम्मेदारियों से मत भागो ॥
गाँधी जी की नहीं सुनी 47 में कौन था वो बेईमान ?
बताओ खानदानी नेताओ पूछ रहा है हिंदुस्तान ॥
सन ४७ में किसने निभाई अपनी यारी ?
बापू को दिया धोखा देश से की गद्दारी॥
देशी शिक्षा देशी कानून । 
नहीं सहेंगे अब विदेशी जूनून ॥ 
कैसा होगा अपना देश ?
दुष्टों को फांसी होगी, भेड़िया नहीं बदलेगा भेष ॥
दुष्टो तुमको शर्म न आई । 
देशभक्तों पर तोहमत लगायी ॥
याद करो ध्रुव और प्रह्लाद को । 
सत्य के लिए छोड़ दिया था बाप को ॥
स्वामीजी तो भारत माँ के लाल हैं।
भ्रष्टों-दुष्टों हेतु बनकर आये काल हैं ॥
ये राजनीति नहीं अन्याय है।
भ्रष्टों गुंडों का व्यवसाय है॥ 
भ्रष्टो कुछ तो शर्म करो। शर्म करो शर्म करो ।
शर्म नहीं तो डूब मरो॥ डूब मरो डूब मरो

साभार  Shri Shankar Dutt Fulara
आभारी अनिल गायकवाड

हम जियेंगे या मरेंगे ...

मेरा  कर्मा  तू  मेरा  धर्मा  तू 

तेरा  सब  कुछ  मैं  मेरा  सब  कुछ  तू 

हर  करम  अपना  करेंगे   -2

ए  वतन  तेरे  लिए 

दिल  दिया  है  जान  भी  देंगे  ए  वतन  तेरे  लिए 

तू  मेरा  कर्मा  तू  मेरा  धर्मा  तू  मेरा  अभिमान  है 

ए  वतन  महबूब  मेरे  तुझपे  दिल  कुर्बान  है 

हम  जियेंगे  या  मरेंगे  ए  वतन  तेरे  लिए 

दिल  दिया  हैं  जान  भी  देंगे  ...

हिन्दू  मुस्लिम  सिख  ईसाई  हमवतन  हमनाम  हैं 

जो  करे  इनको  जुदा  मज़हब  नहीं  इल्जाम  है 

हम  जियेंगे  या  मरेंगे  ...

तेरी  गलियों  में  चलाकर  नफरतों  की  गोलिया 

लूटते  हैं  सब  लुटेरे  दुल्हनों  की  डोलियाँ 

लुट  रहा  है  आंप  वो  अपने  घरों  को  लूट  कर 

खेलते  हैं  बेखबर  अपने  लहू  से  होलियाँ 

हम  जियेंगे  या  मरेंगे  ...

जिस्म मिट जाने से कब हस्तियां मिटा करती है।

जिस्म मिट जाने से

कब हस्तियां मिटा करती है।

जज्बा रहे कायम तो

मंजिले भी मिला करती है।

घुट घुट कर जीने से अच्छा है

कि कुछ कर गुजर जाएं

देश की खातिर मरने वालो

की ही हस्ती रहा करती है।

मुर्दा सोच अभी तक लदी है,

तो ही ऐसे हुक्मरान चुना करती है।

उठो कि ललकारा है वक्त ने

इसीलिए मांए संतान जना करती है।


जय हिन्द.... जय भारत !!!!

जय युवा.... जय क्रांति !!!!

वन्देमातरम !!!!

Sunday, 5 June 2011

अंजानो से कभी दिल न लगाना

अंजानो से कभी दिल  लगाना 
हो सके तो प्यारे खुदको बचाना 

पहले पहले तो ये पास में आयें 
पास आके अपना खास बनायें 
खास बना के फिर डालें ये दाना  हो सके तो प्यारे खुदको बचाना 
झूठी कसमें ये खायें खिलाएँ  जाने क्या क्या ख्वाब दिखाएँ  इनकी बातों में कभी नहीं आना हो सके तो प्यारे खुदको बचाना 
मतलब में बड़े ये शातिर होते बातों में भी ये बड़े माहिर होते होता काम इनका अपना बनाना  हो सके तो प्यारे खुदको बचा

शब्दों ने रास्ते बदल दिए हैं...

क़िताबों  में  से नये शब्द की तरह 
मैंने कई बार तुम्हे 
नोट किया है
फ़िर भी 
तुम मुझे  कभी याद
नहीं रह सकीं....
तुम उभर आई हो
उन ठन्डे शब्दों के भीतर भी
शब्दों के अर्थ ने भीतर के उदास कोने से उठकर 
फ़िर तुम्हारा स्वागत किया है,
उदासी हमारे भीतर की
आधी रह गई है,
दोनों के बीच रिप्लेसमेंट आ गया है.....
अब
शब्दों ने अपने पड़ाव
और
रास्ते
बदल दिए हैं.

गुर्जर समाज इतिहासकरो के अनुसार

गुर्जर समाज, प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है।यह समुदाय गुर्ज्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर नाम से भी जाना जाता है।मुख्यत:गुर्जर मध्य और उत्तर भारत में बसे हैं।

उत्पत्ति

सम्राट मिहिर भोज की मुर्ति:भारत उपवन, अक्शरधाम मन्दिर, नई दिल्ली
गुर्जर अभिलेखो के हिसाब से ये सुर्यवन्शी या रघुवन्शी है।प्राचीमहाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।७ वी से १० वी शतब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर सुर्यदेव की कलाकर्तीया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।राजस्थान में आज भी गुर्जरो को सम्मान मिहिर बोलते है, जिसका अर्थ सुर्य होता है।
कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।कुछ जानकार इन्हे विदेशी भी बताते है क्योन्कि गुर्जरो का नाम एक अभिलेख मे हूणों के साथ मिलता है, परन्तु इसका कोई एतिहासिक प्रमाण नही है।
संस्कृत के विद्वानों के अनुसार, गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ शत्रु का नाश करने वाला अर्थात शत्रु विनाशक होता है।प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे दहाडता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है।

गुर्जर साम्राज्य

इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है।
छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बंगाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी।12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।अरब लेखकों के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयंकर शत्रु थे तथा उन्होंने ये भी कहा है कि अगर गुर्जर नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते।
१८ वी सदी में भी गुर्जरो के कुछ छोटे छोटे राज्य थे।दादरी के गुर्जर राजा, दरगाही सिन्ह के अधीन १३३ ग्राम थे।मेरठ का राजा गुर्जर नैन सिन्ह था तथा उसने परिक्शित गढ का पुन्रनिर्माण करवाया था। भारत गजीटेयर के अनुसार १८५७ की क्रान्ति मे, गुर्जर तथा मुसलमान् रजपुत, ब्रिटिश के बहुत बुरे दुश्मन साबित हुए।गुर्जरो का १८५७ की क्रान्ति मे भी अहम योगदान रहा है।कोटवाल धानसिन्ह गुर्जर १८५७ की क्रान्ति का शहीद था।

]आधुनिक स्तिथि

प्राचीन काल में युद्ध कला में निपुण रहे गुर्जर मुख्य रूप से खेती और पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।गुर्जर अच्छे योद्धा माने जाते थे और इसीलिए भारतीय सेना में अभी भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।गुर्जर राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। राजस्थान में सारे गुर्जर हिंदू हैं।सामान्यत: गुर्जर हिन्दु , सिख, मुस्लिम आदि सभी धर्मो मे देखे जा सकते हैं।मुस्लिम तथा सिख गुर्जर, हिन्दु गुर्जरो से ही परिवर्तित हुए थे।पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।